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Pooja Sharma   2018-09-20

24 सितंबर से पितृपक्ष शुरू, जानें आखिर गया में ही पिंडदान क्यों?

OnlineIndia धर्म l 24 सितंबर से श्राद्ध पक्ष शुरू हो रहे हैं। श्राद्ध का अर्थ होता है अपने पितरों के प्रति श्रद्धा प्रगट करना। पुराणों के अनुसार ऐसी मान्यता है कि जिन लोगों की मृत्यु हो जाती है वे पवित्र आत्माएं किसी ना किसी रूप में श्राद्ध पक्ष में अपनी परिजनों को आशीर्वाद देने के लिए धरती पर आते हैं। और पितरों के जीवित परिजन उनका तर्पण कर उन्हें तृप्त करते हैं।

मान्यताओं के अनुसार, मरने के बाद पिंडदान करना आत्मा को मोक्ष प्राप्ति का सरल रास्ता बताया गया है। श्राद्ध के दौरान हम अपने पूर्वजो का आशीर्वाद पाने के लिए 16 दिनों तक श्राद्ध कर्म करते है। वैसे तो पिंडदान करने के लिए देश में कई स्थानों पर किया जाता है लेकिन सबसे ज्यादा महत्व बिहार के गया में पिंडदान का है। इसी जगह पर भगवान राम और माता सीता ने राजा दशरथ का पिंडदान किया था। पितृ पक्ष के दौरान यहां हजारों की संख्या में लोग अपने पितरों का पिण्डदान करते है। ऐसी मान्यता है कि यदि इस स्थान पर पिण्डदान किया जाय तो पितरों को स्वर्ग मिलता है। माना जाता है कि स्वयं विष्णु यहां पितृ देवता के रूप में मौजूद हैं इसलिए इसे पितृ तीर्थ भी कहा जाता है।
गयासुर राक्षस से जड़ी कथा
शास्त्रों के अनुसार गया का नाम गयासुर राक्षस के कारण रखा गया। दरअसल प्राचीन मान्याताओं के अनुसार भस्मासुर के वंशज गयासुर नाम का एक राक्षस था। उसने कठोर तप करके ब्रह्रााजी से वरदान मांग लिया था कि उसका शरीर भी देवताओं की भांति पवित्र हो जाय और उसके शरीर के दर्शन मात्र से लोगों के सारे पाप नष्ट हो जाए।

गयासुर के कारण ही गया क्षेत्र धीरे-धीरे मोक्ष का क्षेत्र बनाता गया। गयासुर के दर्शन से सारे लोग मरने के बाद स्वर्गलोक पहुंचने लगे। जिससे यमलोक में मृत आत्माओं के पहुंचने का सिलसिला खत्म होने। तब यमराज सहित सभी देवता ब्रह्राा जी के पास पहुंचे और अपनी समस्या सुनाई। इसके बाद गयासुर से ब्रह्राा जी ने कहा कि तुम परम पवित्र हो और सारे देवतागण चाहते है कि आपकी पीठ पर यज्ञ करें। यह सुनकर गयासुर अत्याधिक प्रसन्न हुआ और ऐसा करने के लिए तैयार हो गया।

इसके बाद सभी देवता गयासुर की पीठ पर बैठ गए। देवताओं ने उसपर एक विशाल शिला रख दी। गयासुर के समर्पण को देख भगवान विष्णु ने वरदान दिया, हे गयासुर अब से यह स्थान जहां तुम्हारे शरीर पर यज्ञ हुआ है, वह गया के नाम से जाना जाएगा। तभी से गया मोक्ष क्षेत्र बना। भगवान विष्णु ने कहा यहां पिंडदान और श्राद्ध करने वाले को सुख तो प्राप्त होगा। इसके साथ ही उसके परिवार की मृत आत्माओं को भी मुक्ति मिल जाएगी। उसके परिवार की मृत आत्माओं को भटकना नहीं पड़ेगा।

पिंडदान की अन्य जगहें

बद्रीनाथ
बद्रीनाथ भारत चार प्रमुख धामों में से एक है। बद्रीनाथ के ब्रहमाकपाल क्षेत्र में तीर्थयात्री अपने पितरों की आत्मा की शांति के लिए पिंडदान करते हैं। ऐसी मान्यता है यहीं पर पाण्डवों ने भी अपने पितरों का पिंडदान किया था।

इलाहाबाद
प्रयाग को सभी तीर्थों में प्रमुख स्थान माना जाता है। यहां पर तीन नदिया गंगा, यमुना और सरस्वती का संगम होता है। पितृपक्ष में प्रयाग का विशेष स्थान है। पितृपक्ष में बड़ी संख्या में लोग यहां पर अपने पूर्वजों को श्राद्ध देने आते है।

सिद्धनाथ मध्य प्रदेश
यह स्थान उज्जैन में शिप्रा नदी के किनारे है यहां पर भी पितरों को श्राद्ध अर्पित करते हैं। ऐसी मान्यता है कि इस स्थान पर एक वटवृक्ष है जिसे माता पार्वती ने अपने हाथो से स्वयं लगाया था। पितर पक्ष में बड़ी संख्या में लोग इस स्थान पर अपने पितरों को श्राद्ध देते हैं।

काशी
ऐसी मान्यता है कि काशी में मरने पर मोक्ष की प्राप्ति होती है। काशी पूरे संसार में धर्म और अध्यात्म के लिए जाना जाता है। यह नगर भगवान शिव का माना जाता है। काशी में पिशाचमोचन कुंड पर श्राद्ध का विशेष महत्व होता है । इस स्थान पर अकाल मृत्यु होने पर पिंडदान करने पर मोक्ष प्राप्त होता है।

पिण्डारक गुजरात
गुजरात के द्वारिका से 30 किलोमीटर की दूरी पर पिण्डारक स्थान है यहां पर एक नदी है जहां पर श्राद्ध कर्म करने के बाद नदी मे पिण्ड डालते हैं और अपने पितरों की आत्मा की शान्ति के लिए श्राद्ध कर्म करते हैं।

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