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Pooja Sharma   2018-08-23

जानिए आखिर क्यों दी जाती है बकरा ईद पर कुर्बानी

OnlineIndia डेस्क। हमारा देश यूँ तो त्योहारों का देश है, यहां लगभग हर दूसरे दिन कोई न कोई त्यौहार मनाया जाता है। भारत में लगभग हर धर्म और सम्प्रदाय के लोग रहते हैं और सभी के त्यौहार भी अलग-अलग होते हैं। और इन त्योहारों को मनाए जाने के पीछे की सभी की कहानी भी बड़ी ही दिलचस्प होती है। क्या आप जानते हैं कि ईद-उल-अज़हा या ईद-उल-ज़ुहा या बकरा ईद क्यों मनाया जाता है।
बकरीद को इस्लाम में बहुत ही पवित्र त्योहार माना जाता है पूरी दुनिया में इस्लाम के अनुयायी एक साल में दो तरह ईद मनाते हैं। एक मीठी ईद और दूसरी बकरीद। मीठी ईद के बारे में कहा जाता है कि ये त्यौहार समाज में प्रेम की मिठास घोलने का काम करता है। तो वहीं दूसरी ईद यानी बकरीद को मनाए जाने और इस पर दी जाने वाली क़ुरबानी की दिलचस्प कहानी है। आज हम आपको इसी के बारे में बताते हैं।
ईद उल अज़हा को सुन्नते इब्राहीम भी कहा जाता है, इस्लाम के मुताबिक- अल्लाह ने हजरत इब्राहिम की परीक्षा लेने के उनसे उनकी सबसे प्रिय चीज की कुर्बानी देने का हुक्म दिया। हजरत इब्राहिम को पूरी दुनिया में सबसे ज्यादा प्रिय अपना बेटा था इसीलिए उन्होंने अपने बेटे की कुर्बानी देने का फैसला किया। जब हजरत इब्राहिम अपने बेटे की कुर्बानी देने लगे तब उनके सामने उनके बेटे का प्रेम सामने आ रहा था इसके लिए उन्होंने कुर्बानी देते समय अपनी आँखों पर पट्टी बांध ली। जब अपना काम पूरा करने के बाद पट्टी हटाई तो उन्होंने देखा कि उनका बेटा उनके सामने जिन्दा खड़ा था और बेदी पर एक कटा हुआ दुम्बा (साउदी में पाया जाने वाला भेंड़ जैसा जानवर) पड़ा हुआ था, तभी से इस मौके पर कुर्बानी देने की प्रथा है।
बकरीद पर एक और परम्परा है कि जिस जानवर की कुर्बानी दी जाती है उसके गोस्त के तीन हिस्से किए जाते हैं। इन तीनों हिस्सों में से एक हिस्सा खुद के लिए और शेष दो हिस्से समाज के गरीब और जरूरतमंद लोगों को बांटा दिया जाता है। ऐसा करके मुस्लिम इस बात का पैगाम देते हैं कि अपने दिल की करीबी चीज़ भी हम दूसरों की बेहतरी के लिए अल्लाह की राह में कुर्बान कर देते।

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