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  2016-06-16

Yes, I want to be in power again: Jogi

रायपुर। पूर्व सीएम अजीत जोगी ने कांग्रेस से अपना 35 साल पुराना नाता आज हमेशा-हमेशा के लिए तोड़ लिया। जोगी ने कांग्रेस की प्राथमिकता से अपना इस्तीफा बुधवार को अध्यक्ष सोनिया गांधी को भेज दिया। इसकी जानकारी मीडिया को देते हुए जोगी काफी भावुक हो गए थे। नौकरशाही से राजनीति में आए जोगी ने 90 के दशक में राजीव गांधी के आग्रह पर कांग्रेस पार्टी ज्वाइन की थी। एक लाइन में भेजा अपना इस्तीफा तीन दशक के अपने राजनीतिक कैरियर में जोगी पार्टी के प्रवक्ता, राज्यसभा सांसद से लेकर छत्तीसगढ़ के पहले सीएम तक रहे। पिछले 10 सालों में जोगी की गतिविधियों को लेकर पार्टी आलाकमान नाखुश रहने लगा था। साथ ही दोनों के बीच दूरियां भी बढ़ने लगी थीं। उन्हें बीते 6 जनवरी को पार्टी विरोधी गतिविधियों के चलते पीसीसी ने निष्कासित कर दिया गया था। इस पर फैसला करीब 5 माह तक लटकाए रखा। अंतत: 6 जून को जोगी का धैर्य टूट गया और उन्होंने कांग्रेस छोड़ नई पार्टी बनाने का ऐलान कर दिया। वे जुलाई में नई पार्टी गठन करने की तैयारी में हैं। इसके लिए सबसे महत्वपूर्ण कांग्रेस से अपना इस्तीफा आज दे दिया। जोगी ने सोनिया गांधी को एक लाइन में अपना इस्तीफा भेजा है। पार्टी बनाने का रास्ता साफ कांग्रेस से इस्तीफे के साथ ही जोगी के नई पार्टी बनाने का रास्ता साफ हो गया है। उन्हें नई पार्टी बनाने के लिए चुनाव आयोग में शपथ पत्र देना होगा कि वे किसी दूसरी पार्टी के सदस्य नहीं हैं। ऐसा प्रावधान नई पार्टी के पंजीयन के लिए भी है। जोगी अपनी नई पार्टी का गठन जुलाई में करने का ऐलान कर चुके हैं। इसके लिए उन्होंने आम लोगों से सुझाव भी मांगे थे। इसमें पार्टी के नए नाम और चिन्ह को लेकर अब तक 28 हजार से अधिक सुझाव मिल चुके हैं। जोगी के करीबियों के मुताबिक नई पार्टी के नाम में कांग्रेस शब्द अवश्य शामिल होगा। वहीं चिन्ह के लिए नारियल और सीटी अधिक पसंद किए जा रहे हैं। जिस धरती में मेरा नेरुआ गड़ा, उसी के लिए करूंगा काम कांग्रेस और अजीत जोगी का पिछले 35 सालों का गठबंधन आखिरकार टूट गया। जिस कांग्रेस को जोगी अपना परिवार बताते थे, वही अब उनके लिए प्रासंगिक नहीं रह गई है। आखिर क्या और कैसे उनको कांग्रेस सेे दूर कर गया, इसे लेकर पढ़िए जोगी के दिल की बात, उनके ही शब्दों में:- मैंने आज कांग्रेस की प्राथमिक सदस्यता से इस्तीफा दे दिया है। प्रश्न है कि 30-35 साल तक कांग्रेस से जुड़े रहने के बाद ये फैसला, दो कारण हैं। पहला- मैं अब अपने राजनीतिक जीवन के अंतिम सोपान में हूं। मेरे पास सक्रिय राजनीति के सिर्फ पांच साल बचे हैं। अब मैं देश की नहीं, प्रदेश की राजनीति करूंगा, जहां मेरा नेरुआ गड़ा है। उन्होंने कहा कि यहीं की आबोहवा, पानी, अन्न ने मुझे इसी जीवन में इंजीनियर, वकील, आईपीएस, आईएएस, राज्यसभा, लोकसभा, कांग्रेस का मुख्य प्रवक्ता, छत्तीसगढ़ का प्रथम सीएम तक बनाया। अब इस कर्ज को लौटाना भी है। दूसरा- प्रदेश के फैसले दिल्ली से तय नहीं होंगे। कांग्रेस कभी हिमालय पर्वत की तरह थी, लेकिन अब वह पिघल गई है। अब वो जमाना गया। आज देश के महज 7 % हिस्से में ही कांग्रेस है। उसके केवल 44 सांसद ही रह गए हैं। और वैसे भी, कांग्रेस से मेरा मोहभंग नहीं हुआ है, बल्कि एक नया मोह पैदा हो गया है। ये नया मोह प्रदेश के ढाई करोड़ लोगों के लिए है। यहां बलरामपुर से बीजापुर तक मेरे लोग हैं। मेरा जनाधार है। यहां के 20 हजार गांव में से ऐसा एक भी गांव नहीं है, जहां मेरे लोग नहीं होंगे। यह बात तो डा. रमन सिंह में भी नहीं है। ऐसे में मैं उनके लिए काम क्यों न करूं? उन्होंने कहा कि छत्तीसगढ़ के 90 विधानसभा का निर्णय दिल्ली में होता है। उम्मीदवारों के बारे में कहते हैं कि मेरा गधा, आपके घोड़े से बेहतर है। मेरे पास सक्रिय राजनीति के लिए केवल चार या पांच साल ही बचे हैं। साथ ही उन्होंने कहा कि चार या पांच साल में ही मैं ढांचा तैयार कर लेना चाहता हूं। मैं यहां पर सत्ता पर काबिज होना चाहता हूं। क्योंकि बिना सत्ता पर काबिज हुए परिवर्तन नहीं हो सकता है। परिवर्तन तभी होगा जब मैं सत्ता पर काबिज होऊंगा।

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